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UP पंचायत चुनाव: OBC आरक्षण में देरी पर हाईकोर्ट सख्त, सरकार से मांगी प्रगति रिपोर्ट

 Newsbaji  |  Jun 05, 2026 04:28 PM  | 
Last Updated : Jun 05, 2026 04:28 PM
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताई
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताई

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायत चुनावों की तैयारियों को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताई है। कोर्ट ने कहा कि ओबीसी आरक्षण निर्धारण की प्रक्रिया को लेकर सरकार को काफी पहले सक्रियता दिखानी चाहिए थी, लेकिन अब तक प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी है।

न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अबधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि, ओबीसी आरक्षण का मुद्दा लंबे समय से सरकार के संज्ञान में था। इसके बावजूद आवश्यक प्रक्रिया अभी भी जारी है। अदालत ने कहा कि ओबीसी आयोग का गठन कर सिफारिशें तो मांगी गईं, लेकिन उन पर समयबद्ध तरीके से अमल नहीं किया गया।

10 जुलाई तक प्रगति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश
आशीष कुमार सिंह, ओम प्रकाश प्रजापति और खुशीराम की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने राज्य निर्वाचन आयोग और ओबीसी आयोग को 10 जुलाई 2026 तक पंचायत चुनावों से संबंधित प्रगति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि ओबीसी आरक्षण निर्धारण की प्रक्रिया जारी है। वहीं, राज्य निर्वाचन आयोग ने कहा कि मतदाता सूची का प्रकाशन 10 जून 2026 को प्रस्तावित है।

प्रशासकों की नियुक्ति को चुनौती
याचिकाकर्ताओं ने उस शासनादेश को भी चुनौती दी है, जिसके तहत ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद प्रधानों को प्रशासक नियुक्त किया गया है। उनका तर्क है कि यह व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 243-ई की भावना के विपरीत है, जो पंचायतों में नियमित और समयबद्ध चुनाव सुनिश्चित करने का प्रावधान करता है।

हजारों पंचायतें प्रशासकों के भरोसे
उत्तर प्रदेश में पिछला ग्राम पंचायत चुनाव वर्ष 2021 में हुआ था। पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा होने के बाद प्रदेश की कई ग्राम पंचायतों में प्रशासक तैनात हैं। ओबीसी आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद राज्य सरकार ने नई आरक्षण प्रक्रिया शुरू की है और फिलहाल ओबीसी आयोग की रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था पर जोर
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पंचायती राज संस्थाओं में लोकतांत्रिक व्यवस्था की निरंतरता बनाए रखना आवश्यक है। अदालत की टिप्पणी से यह संकेत मिला है कि पंचायत चुनावों में और देरी को लेकर न्यायालय गंभीर है। यदि निर्धारित समय तक संतोषजनक प्रगति नहीं होती है तो अदालत आगे और सख्त रुख अपना सकती है।

प्रदेश में हजारों ग्राम पंचायतों के प्रशासकों के भरोसे संचालित होने के बीच अब सरकार और संबंधित आयोगों पर आरक्षण प्रक्रिया जल्द पूरी कर चुनाव कराने का दबाव बढ़ गया है।

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