दिल्ली। छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित कथित शराब घोटाला मामले में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य बघेल को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने उनकी जमानत को बरकरार रखते हुए प्रवर्तन निदेशालय (ED) और छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से दायर याचिकाओं को खारिज कर दिया। हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामले में उठे कानूनी सवालों पर भविष्य में सुनवाई जारी रहेगी।
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि, फिलहाल छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के जमानत आदेश में हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि मामले के कानूनी पहलुओं पर अंतिम राय बाद की सुनवाई में तय की जाएगी।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस आदेश में जांच एजेंसियों को लेकर की गई कुछ प्रतिकूल टिप्पणियों को अनावश्यक माना और उन्हें रिकॉर्ड से हटाने का निर्देश दिया।
ED और राज्य सरकार ने दी थी चुनौती
चैतन्य बघेल को जनवरी में हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद ED और छत्तीसगढ़ सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। जांच एजेंसियों का कहना था कि मामले की गंभीरता को देखते हुए जमानत रद्द की जानी चाहिए। याचिका में यह भी दावा किया गया कि जमानत मिलने के बाद कुछ महत्वपूर्ण गवाह सामने आने से हिचक रहे हैं, जिससे जांच प्रभावित हो सकती है।
वहीं, बचाव पक्ष ने दलील दी कि हाईकोर्ट ने सभी उपलब्ध तथ्यों और रिकॉर्ड पर विचार करने के बाद ही जमानत दी थी। साथ ही यह भी बताया गया कि मामले की जांच लंबे समय से चल रही है।
2 जनवरी को मिली थी जमानत
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 2 जनवरी को कथित शराब घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग और भ्रष्टाचार के मामलों में चैतन्य बघेल को जमानत दी थी। इसी आदेश को चुनौती देते हुए ED, आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (EOW) और राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे, लेकिन शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।
क्या है शराब घोटाला मामला?
यह मामला छत्तीसगढ़ के कथित शराब घोटाले से जुड़ा है। इस मामले की जांच ED और केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) अलग-अलग पहलुओं से कर रही हैं। ED का आरोप है कि वर्ष 2019 से 2022 के बीच राज्य की शराब कारोबार व्यवस्था का दुरुपयोग कर अवैध आर्थिक लाभ कमाया गया, जिससे सरकारी राजस्व को भारी नुकसान पहुंचा।
जांच एजेंसियों के अनुसार शुरुआती जांच में संकेत मिले कि शराब की खरीद, आपूर्ति और बिक्री से जुड़ी व्यवस्था पर एक संगठित नेटवर्क का प्रभाव था। आरोप है कि इस नेटवर्क में कुछ अधिकारी, कारोबारी और अन्य प्रभावशाली लोग शामिल थे। एजेंसियों का दावा है कि शराब नीति में कथित हेरफेर के जरिए अवैध कमाई की गई और सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाया गया।
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