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अनूप रंजन पाण्डेय को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने किया सम्मानित

 Newsbaji  |  Aug 14, 2026 09:33 AM  | 
Last Updated : Aug 14, 2026 09:33 AM
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्राप्त करते छत्तीसगढ़ के संस्कृतिकर्मी अनूप रंजन पाण्डेय
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्राप्त करते छत्तीसगढ़ के संस्कृतिकर्मी अनूप रंजन पाण्डेय

दिल्ली/रायपुर। छत्तीसगढ़ की लोक एवं आदिवासी कला-संस्कृति को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाने वाले प्रसिद्ध संस्कृतिकर्मी, रंगकर्मी और पद्मश्री अनूप रंजन पाण्डेय को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। नई दिल्ली में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने उन्हें यह प्रतिष्ठित सम्मान प्रदान किया। देशभर से पहुंचे विभिन्न विधाओं के कलाकारों के बीच पाण्डेय का सम्मान छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक एवं आदिवासी सांस्कृतिक परंपरा की राष्ट्रीय पहचान के रूप में देखा जा रहा है।

सम्मान प्राप्त करने के बाद अनूप रंजन पाण्डेय ने इसे अपनी व्यक्तिगत उपलब्धि न बताते हुए छत्तीसगढ़ के लोक एवं आदिवासी कलाकारों और प्रदेश की जनता को समर्पित किया। उन्होंने कहा कि यह सम्मान उन हजारों कलाकारों की साधना का सम्मान है, जो पीढ़ियों से लोककला, लोकसंगीत, लोकनाट्य और आदिवासी परंपराओं को जीवित रखे हुए हैं।

लोक और जनजातीय कला हमारी सांस्कृतिक स्मृति : राष्ट्रपति
समारोह को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहा कि, सम्मानित कलाकार मिलकर भारत का ऐसा सांस्कृतिक मानचित्र प्रस्तुत करते हैं, जिसमें देश की मिट्टी की कथाएं और गीत, विविध नृत्य एवं उत्सव तथा सदियों से विकसित भाषाओं और बोलियों की स्मृतियां समाहित हैं।

राष्ट्रपति ने गुरु-शिष्य परंपरा को भारतीय कला परंपरा की महत्वपूर्ण आधारशिला बताते हुए कहा कि हमारी कलाओं की सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक जीवंत गुरु होते हैं। उन्होंने लोक एवं जनजातीय कलाओं के संरक्षण पर विशेष जोर देते हुए कहा कि तेजी से बदलते समय में अनेक लोककलाएं विलुप्ति के संकट से गुजर रही हैं। ऐसे में केवल दस्तावेजीकरण ही नहीं, बल्कि इन्हें जीवंत बनाए रखने के लिए भी विशेष प्रयास जरूरी हैं।

9 वर्ष की उम्र से शुरू हुई सांस्कृतिक यात्रा
21 जुलाई 1965 को बिलासपुर में जन्मे और जांजगीर-चांपा जिले के ग्राम कोसा से जुड़े अनूप रंजन पाण्डेय की सांस्कृतिक यात्रा चार दशक से अधिक लंबी है। संगीत, साहित्य और संस्कृति की प्रारंभिक शिक्षा उन्हें अपनी माता एवं गुरु स्वर्गीय मनोरमा पाण्डेय तथा पिता एवं गुरु, शिक्षाविद एवं संस्कृत विद्वान स्वर्गीय राधेश्याम पाण्डेय से मिली।

गांव में होने वाले नाचा और कृष्ण की बाल लीलाओं पर आधारित रहस लोकनाट्य ने बचपन में ही उन्हें गहराई से प्रभावित किया। महज 9 वर्ष की उम्र में उन्होंने रेलवे स्कूल, बिलासपुर के मंच से अपनी पहली औपचारिक प्रस्तुति दी। आगे चलकर बड़े भाई एवं अभिनेता इंजीनियर आलोक रंजन पाण्डेय से उन्होंने अभिनय की बारीकियां सीखीं।

3000 से अधिक नुक्कड़ नाटकों से जनजागरण
अनूप रंजन पाण्डेय के सांस्कृतिक जीवन में 1990 का दशक विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा। राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के तहत उन्होंने गांव-गांव पहुंचकर नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से जनजागरूकता अभियान चलाया। महिला सशक्तीकरण, पर्यावरण संरक्षण, जनस्वास्थ्य और साक्षरता जैसे विषयों को केंद्र में रखकर उन्होंने 3000 से अधिक नुक्कड़ नाटकों में सहभागिता की। यह दौर उनके लिए केवल रंगमंचीय यात्रा नहीं था, बल्कि लोक माध्यमों के जरिए समाज तक संदेश पहुंचाने और आमजन को जागरूक करने का प्रभावी अभियान भी था।

हबीब तनवीर के ‘नया थिएटर’ से मिली नई पहचान
इसी दौर में उन्हें पद्मभूषण हबीब तनवीर के निर्देशन में ‘नया थिएटर’ के साथ काम करने का अवसर मिला। ‘चरणदास चोर’, ‘मिट्टी की गाड़ी’, ‘आगरा बाजार’, ‘मुद्राराक्षस’, ‘मोर नाव दमाद गाँव के नाव ससुरार’, ‘सड़क’, ‘राजरक्त’, ‘वेणीसंहार’ और ‘जिस लाहौर देख्या नई जन्मयाई नई’ जैसे चर्चित नाटकों में उन्होंने अभिनय किया। नया थिएटर के साथ काम करते हुए उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों के साथ इंग्लैंड, स्कॉटलैंड और जर्मनी की यात्राएं भी कीं। इस अनुभव ने छत्तीसगढ़ी लोक रंगपरंपरा को व्यापक रंगमंचीय दृष्टि से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

80 लोकवाद्य संग्रहालय को, 200 सुषिर वाद्यों का संग्रह
छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद पाण्डेय ने 80 लोकवाद्य महंत घासीदास संग्रहालय, संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ शासन को प्रदान किए। वहीं मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय, भोपाल के लिए उन्होंने देशभर से 200 सुषिर लोकवाद्यों का संग्रह किया। इन लोकवाद्यों का प्रदर्शन भोपाल में आयोजित ‘गंधर्व लोकरंग’ में किया गया और वर्तमान में ये वाद्य त्रिवेणी संग्रहालय, उज्जैन में प्रदर्शित हैं। लोकवाद्यों के संरक्षण का उनका यह प्रयास उन परंपराओं को संग्रहालयों और नई पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जाता है।

बस्तर बैंड ने लोकवाद्यों को दिया नया मंच
बस्तर की सांस्कृतिक यात्रा के दौरान पारंपरिक वाद्य ‘ढूसिर’ की संगत में ‘लिंगों पेन की गाथा’ सुनकर पाण्डेय गहराई से प्रभावित हुए। इसी अनुभव ने उन्हें बस्तर की दुर्लभ लोकवाद्य परंपराओं के संरक्षण और प्रस्तुतीकरण की दिशा में प्रेरित किया। लगभग डेढ़ दशक पहले उन्होंने बस्तर के आदिवासी कलाकारों के साथ मिलकर ‘बस्तर बैंड’ की स्थापना की। इस बैंड ने बस्तर के पारंपरिक और दुर्लभ लोकवाद्यों को मंच पर नई पहचान देने के साथ लोकगीत, लोकसंगीत, लोकगाथा, मिथक और आदिवासी सांस्कृतिक परंपराओं को व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचाया।

बंदूक छोड़ो… ढोल पकड़ो’ बना शांति का सांस्कृतिक संदेश
बस्तर बैंड की सबसे उल्लेखनीय पहलों में ‘बंदूक छोड़ो… ढोल पकड़ो’ अभियान शामिल रहा। इस अभियान का उद्देश्य युवाओं को हिंसा से दूर कर रचनात्मक गतिविधियों से जोड़ना और लोककला-संगीत के माध्यम से शांति का संदेश देना था। इस पहल के तहत बिखराव के संकट से जूझ रही 100 से अधिक कला मंडलियों को पुनर्गठित किया गया और 5000 से अधिक कलाकारों को सक्रिय किया गया। बस्तर बैंड के 11 कलाकारों को राष्ट्रीय और राज्य स्तर के पुरस्कार भी मिल चुके हैं।

बस्तर की लोकसंस्कृति की गूंज भारत की सीमाओं से बाहर भी पहुंची। बैंड ने रूस, नाइजीरिया, दक्षिण अफ्रीका और इटली सहित विभिन्न देशों में अपनी प्रस्तुतियां दीं।

पद्मश्री सहित कई प्रतिष्ठित सम्मान
अनूप रंजन पाण्डेय की दीर्घकालीन सांस्कृतिक साधना को कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा जा चुका है। संस्कृति मंत्रालय की गुरु-शिष्य परंपरा योजना के तहत उन्होंने 2006 से 2008 तक लोकनाट्य ‘तारे-नारे’ के गुरु के रूप में प्रशिक्षण दिया। उन्हें वरिष्ठ अध्येतावृत्ति सम्मान-2016, टैगोर नेशनल स्कॉलरशिप 2019-20, छत्तीसगढ़ शासन का दाऊ मंदराजी लोक कला सम्मान-2014 और राष्ट्रीय स्वयं सिद्धश्री सम्मान-2017 सहित अनेक सम्मान प्राप्त हुए।

भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 2019 में पद्मश्री से सम्मानित किया था। इसके अतिरिक्त उन्हें राष्ट्रीय तुलसी सम्मान, मध्यप्रदेश तथा लोक कला सम्मान, भिलाई इस्पात संयंत्र सहित विभिन्न सम्मानों से भी नवाजा जा चुका है।

सम्मान से बढ़ी छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान
अनूप रंजन पाण्डेय को मिला संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार केवल एक कलाकार का सम्मान नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की लोक एवं आदिवासी कला परंपरा की व्यापक राष्ट्रीय पहचान का प्रतीक है। चार दशक से अधिक समय से लोकमंच, नुक्कड़ नाटक, लोकवाद्य, आदिवासी संगीत, रंगकर्म और सांस्कृतिक संरक्षण के क्षेत्र में सक्रिय पाण्डेय ने लोककला को संग्रहालयों और पुस्तकों तक सीमित रखने के बजाय जीवंत मंच, जनसमुदाय और नई पीढ़ी से जोड़ने का काम किया है।
 

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