रायपुर। छत्तीसगढ़ में बिजली वितरण के निजीकरण को लेकर विरोध के स्वर तेज होने लगे हैं। देश की प्रमुख ऊर्जा कंपनी टाटा पावर ने छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर और आसपास के चार महत्वपूर्ण क्षेत्रों में बिजली वितरण का अधिकार हासिल करने की दिशा में कदम बढ़ा दिया है।
कंपनी ने रायपुर, धरसींवा, मंदिर हसौद और अभनपुर तहसीलों में समानांतर विद्युत वितरण लाइसेंस प्राप्त करने के लिए छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत नियामक आयोग के समक्ष आधिकारिक आवेदन प्रस्तुत किया है। इस आवेदन के सामने आते ही प्रदेश की बिजली व्यवस्था, सरकारी वितरण कंपनी के भविष्य और उपभोक्ताओं पर निजीकरण के संभावित प्रभावों को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।
छह नवंबर तक आम जनता से मांगी गई दावा-आपत्ति
टाटा पावर के आवेदन पर छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत नियामक आयोग नियमानुसार प्रक्रिया आगे बढ़ा रहा है। आयोग ने इस प्रस्ताव को लेकर आम जनता, उद्योग जगत, बिजली उपभोक्ता संगठनों और अन्य संबंधित हितधारकों से छह नवंबर तक दावा-आपत्ति आमंत्रित की है। वहीं, टाटा पावर को छह दिसंबर तक आयोग के समक्ष अपना विस्तृत जवाब और लिखित स्पष्टीकरण प्रस्तुत करना होगा। इसके बाद आयोग उपलब्ध तथ्यों, आपत्तियों और नियामकीय प्रावधानों के आधार पर आगे की वैधानिक प्रक्रिया तय करेगा।
चार महत्वपूर्ण क्षेत्रों में वितरण व्यवस्था पर नजर
टाटा पावर जिन क्षेत्रों में बिजली वितरण का लाइसेंस चाहती है, उनमें रायपुर, धरसींवा, मंदिर हसौद और अभनपुर शामिल हैं। ये क्षेत्र राजधानी के शहरी विस्तार, औद्योगिक गतिविधियों और व्यावसायिक विकास की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं। ऐसे में यदि कंपनी को समानांतर वितरण लाइसेंस मिलता है तो इन क्षेत्रों में सरकारी बिजली वितरण कंपनी के साथ निजी कंपनी की भी मौजूदगी हो सकती है।
हालांकि, आवेदन प्रस्तुत होने का अर्थ लाइसेंस मिल जाना नहीं है। इस पर अंतिम निर्णय नियामक आयोग की प्रक्रिया और उसके आदेश के बाद ही होगा।
बिजली कर्मचारियों और इंजीनियरों में नाराजगी, संघ ने जताया विरोध
निजी कंपनी के इस कदम से प्रदेश के बिजली कर्मचारियों, इंजीनियरों और अधिकारियों में नाराजगी बढ़ गई है। राज्य विद्युत अभियंता संघ ने टाटा पावर के आवेदन का पुरजोर विरोध करते हुए इसे सार्वजनिक बिजली वितरण व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बताया है।
संघ के पदाधिकारियों ने चिंता जताई है कि, समानांतर विद्युत वितरण लाइसेंस लागू होने से प्रदेश की मौजूदा बिजली व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। उनके अनुसार, इससे सरकारी विद्युत वितरण कंपनी की वित्तीय स्थिति कमजोर होने का खतरा है। उन्होंने आशंका जताई कि निजी कंपनियां व्यावसायिक रूप से लाभकारी क्षेत्रों पर अधिक ध्यान केंद्रित कर सकती हैं, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी पर अपेक्षाकृत कम लाभ वाले और महंगे क्षेत्रों में आपूर्ति की जिम्मेदारी बनी रह सकती है।
क्या सरकारी बिजली कंपनी पर बढ़ेगा आर्थिक दबाव?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल सरकारी बिजली वितरण कंपनी की आर्थिक स्थिति को लेकर उठ रहा है। विरोध कर रहे बिजली इंजीनियरों का तर्क है कि यदि निजी कंपनी को समानांतर वितरण की अनुमति मिलती है तो उपभोक्ताओं के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ने के साथ-साथ सरकारी कंपनी के राजस्व और उपभोक्ता आधार पर भी असर पड़ सकता है।
संघ का मानना है कि इससे स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के बजाय असंतुलित आर्थिक व्यवस्था पैदा हो सकती है, जिसका दीर्घकालिक नुकसान अंततः आम उपभोक्ताओं और प्रदेश की बिजली व्यवस्था को उठाना पड़ सकता है।
अब आयोग के फैसले पर टिकी निगाहें
टाटा पावर के आवेदन ने छत्तीसगढ़ में बिजली वितरण व्यवस्था के भविष्य को लेकर एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा कर दिया है। एक ओर निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रतिस्पर्धा और बेहतर सेवाओं के संभावित माध्यम के रूप में देखा जा सकता है, वहीं दूसरी ओर बिजली कर्मचारियों और इंजीनियरों को सार्वजनिक वितरण व्यवस्था के कमजोर होने की आशंका सता रही है।
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