भिलाई/दुर्ग। छत्तीसगढ़ की पारंपरिक ‘चौक पूरने’ और ‘हाथा देने’ की लोकपरंपरा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने का कार्य शिक्षाविद् श्रीमती स्मिता वर्मा कर रही हैं। दुर्ग जिले के लिमतरा ग्राम में जन्मी स्मिता वर्मा वर्तमान में हाईस्कूल में गणित की व्याख्याता हैं, लेकिन उनकी पहचान एक कुशल रंगोली कलाकार के रूप में भी तेजी से स्थापित हो रही है।
छत्तीसगढ़ में त्योहारों और मांगलिक अवसरों पर चौक बनाने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। विभिन्न त्योहारों पर अलग-अलग प्रकार की रंगोलियां बनाई जाती हैं, जिन्हें शुभ माना जाता है। स्मिता वर्मा ने बचपन से ही इस लोककला को सीखना शुरू किया। परिवारजनों से प्रारंभिक प्रशिक्षण लेने के बाद उन्होंने भिलाई में पड़ोस की महिलाओं से इस कला को और निखारा। उनकी प्रतिभा को कई प्रतियोगिताओं में सम्मानित किया जा चुका है।
.jpeg)
आकर्षक रंगोलियों को दिया आकार
अब तक वे लगभग 500 से अधिक विषयगत और आकर्षक रंगोलियां बना चुकी हैं। उनकी कृतियों में छत्रपति शिवाजी महाराज, स्वामी दयानंद, गुरु बाबा घासीदास, हनुमानजी और सावित्रीबाई फुले जैसे महापुरुषों के चित्रों के साथ-साथ राष्ट्रीय पर्व, धार्मिक उत्सव, हैप्पी क्रिसमस, मकर संक्रांति, नाग पंचमी, स्वतंत्रता दिवस तथा नशा-निरोध जैसे सामाजिक विषय भी शामिल हैं।

स्मिता वर्मा न केवल स्वयं इस कला का सृजन करती हैं, बल्कि बच्चों और महिलाओं को भी रंगोली बनाना सिखाती हैं। अपने विद्यालय के विद्यार्थियों के साथ-साथ आसपास की महिलाओं के साथ वे इस कला का आदान-प्रदान करती रहती हैं। उन्होंने सिलाई में भी विधिवत प्रशिक्षण प्राप्त किया है।

बता दे कि, साहित्यकार डॉ. परदेशीराम वर्मा की पुत्री और प्रसिद्ध कलाकार महेश वर्मा की भतीजी हैं। कला और साहित्य दोनों में गहरी रुचि रखने वाली स्मिता वर्मा की यात्रा-वृत्तांतों की पुस्तक भी शीघ्र प्रकाशित होने वाली है। लोककला, शिक्षा और सृजनात्मकता का यह संगम स्मिता वर्मा को क्षेत्र में एक विशिष्ट पहचान प्रदान कर रहा है।
राजीव भवन में चोरी से मचा हड़कंप, AC समेत लाखों का सामान पार, दो गिरफ्तार
भाजपा की डिजिटल लर्निंग कार्यशाला संपन्न, संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने पर जोर
Copyright © 2021 Newsbaji || Website Design by Ayodhya Webosoft