रायपुर. प्रदेश में आरक्षण को लेकर राज्य सरकार और राजभवन के बीच जारी विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है. मामला हाई कोर्ट तक पहुंच चुका है, जहां से पहले राजभवन के सचिवालय को नोटिस जारी किया गया और फिर सचिवालय से इस नोटिस की संवैधानिकता पर सवाल उठाते हुए याचिका दायर की गई. वहीं अब नया मामला ये कि राजभवन से राज्य सरकार के मुख्य सचिव (सीएस) को कड़ा पत्र लिखा गया है. इसमें स्पष्ट किया गया है कि राज्यपाल ने महाधिवक्ता के प्रति घोर अप्रसन्नता व्यक्त की है. इस मामले में उन्हें पांच दिन के भीतर जवाब दिया जाना चाहिए.
राज्यपाल के सचिव अमृत खलखो की ओर से जारी पत्र में राज्य के मुख्य सचिव को संबोधित करते हुए जो लिखा गया है उसके पीछे कारणों की बात करें तो वजह ये है कि हाई कोर्ट में राज्य शासन की ओर से याचिका दायर की गई थी. इसमें राज्यपाल के निर्णय पर ही सवाल उठाया गया है. इस मामले की सुनवाई की पूरी प्रक्रिया के दौरान महाधिवक्ता (AG) सतीशचंद्र वर्मा की भी बड़ी भूमिका रही. इसे लेकर ही पत्र में पूरी बात कही गई है.
ये लिखा है पत्र में-
राज्यपाल महोदया को विभिन्न समाचार पत्रों एवं विभिन्न प्रिंट मीडिया के माध्यम से एवं माननीय उच्च न्यायालय की वेबसाइट के केस डिटेल से ज्ञात हुआ है कि, राज्य शासन ने माननीय राज्यपाल महोदया के सचिवालय के विरुद्ध रिट याचिका छत्तीसगढ़ लोक सेवा (अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण) (संशोधन) विधेयक, 2022 क्रमांक 19 एवं 19 सन् 2022 ) में माननीया राज्यपात महोदया को निर्देश देने एवं माननीय राज्यपात की अनुच्छेद 200 के तहत प्रदान की गई शक्तियों के संबंध में प्रस्तुत किए हैं। उक्त रिट याचिका में राज्य शासन की ओर से राज्य शासन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री कपिल सिब्बत एवं राज्य के एडवोकेट जनरल श्री सतीश चंद्र वर्मा भी उपस्थित हुए। राज्य शासन का माननीय राज्यपाल महोदया के विरुद्ध उक्त प्रकार से रिट पाचिका प्रस्तुत करना और उसमें राज्य के एडवोकेट जनरल द्वारा माननीय राज्यपाल के विरुध्द पेरवी करना माननीय उच्चतम न्यायालय की उक्त संवैधानिक पीठ द्वारा पारित निर्णय दिनांक 24 जनवरी 2006 के पैरा 173 के पूर्णतः विरुद्ध है। ऐसा अभिमत माननीया राज्यपाल का उक्त संवैधानिक पीठ ने अपने निर्णय के पैरा 173 में यह अभिनिर्धारित किया है कि. यदि राज्यपात के विरुद्ध कोई रिट याचिका प्रस्तुत होती है तो उसमें राज्यपाल की प्रतिरक्षा शासन द्वारा होती है। इस संबंध में संविधान का अनुच्छेद- 361 भी अवलोकनीय है, जिसमे यह प्रावधान है कि राज्य के राज्यपाल अपने पद की शक्तियों के प्रयोग और कर्तव्यों का पालन करते हुए अपने द्वारा किए गए या किये जाने के लिए तात्पयापित किसी कार्य के लिए किसी न्यायालय को उत्तरदायी नहीं होगा।
इनके अलावा आरक्षण को लेकर भी बात कही गई है और फिर पांच दिनों के भीतर महाधिवक्ता से जवाब को लेकर भी बात कही गई है. अब इस पत्र के बाद इस मामले ने फिर से चर्चा का रूप ले लिया है. हालांकि अभी राज्य शासन की ओर से इसे लेकर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है. जबकि महाधिवक्ता सतीशचंद्र वर्मा ने कहा है कि उनके पास अभी कोई पत्र नहीं आया है. यदि आएगा तब कोई प्रतिक्रिया दे पाऊंगा.
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