टिप्पणी। छत्तीसगढ़ की स्वास्थ्य व्यवस्था आज एक खामोश असंतोष के दौर से गुजर रही है। एक ऐसा असंतोष, जो अभी शब्दों में नहीं, लेकिन जल्द ही सड़कों पर दिखाई दे सकता है। यह असंतोष उन डॉक्टरों के भीतर पनप रहा है, जो इस व्यवस्था की रीढ़ हैं। पीजी डॉक्टर, बॉन्डेड डॉक्टर और अब तेजी से जुड़ती एक और उपेक्षित श्रेणी, सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टर।
पिछले तीन वर्षों से पीजी डॉक्टरों के स्टाइपेंड और बॉन्डेड डॉक्टरों के वेतन में कोई वृद्धि नहीं हुई है। महंगाई बढ़ी, जिम्मेदारियां बढ़ीं, मरीजों का दबाव बढ़ा, लेकिन डॉक्टरों की आय वहीं ठहरी रही। इससे भी अधिक चिंताजनक यह है कि एक डॉक्टर जब अपनी विशेषज्ञता बढ़ाकर पीजी डिग्री प्राप्त करता है, तो उसे बेहतर पारिश्रमिक मिलने के बजाय कई बार आर्थिक रूप से और नुकसान उठाना पड़ता है।
लेकिन छत्तीसगढ़ की स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी और गंभीर समस्या इससे भी आगे है। सुपर स्पेशलिटी कैडर का अभाव। देशभर में जहाँ डीएम, एमसीएच और डीआरएनबी जैसे उच्चतम चिकित्सा डिग्रीधारी डॉक्टरों के लिए अलग कैडर, अलग वेतनमान और स्पष्ट करियर संरचना होती है, वहीं छत्तीसगढ़ में आज भी इन सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टरों के लिए कोई अलग व्यवस्था नहीं है।
यह स्थिति न केवल नीति की कमी को दर्शाती है, बल्कि प्रतिभा के पलायन (brain drain) को भी बढ़ावा दे रही है। जिन डॉक्टरों ने वर्षों की कठिन पढ़ाई और प्रशिक्षण के बाद सुपर स्पेशलिटी डिग्री हासिल की है, उन्हें न तो उनके कौशल के अनुरूप पद मिल रहा है और न ही वेतन। कई मामलों में डीएम, एमसीएच और डीआरएनबी डॉक्टरों को सामान्य स्पेशलिस्ट के समान वेतन पर काम करने को मजबूर होना पड़ रहा है। यह न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि राज्य के लिए दीर्घकालिक नुकसान का कारण भी है।
ग्रामीण छत्तीसगढ़ की तस्वीर और भी कठोर है। बॉन्डेड डॉक्टर सीमित संसाधनों, स्टाफ की कमी और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में काम कर रहे हैं। वे केवल इलाज नहीं कर रहे, बल्कि एक कमजोर स्वास्थ्य ढांचे को संभाल रहे हैं। इसके बावजूद उनके वेतन में कोई वृद्धि नहीं होना, उनके योगदान के प्रति उदासीनता को दर्शाता है।
यह सवाल अब केवल वेतन वृद्धि का नहीं है, यह सवाल है नीति, प्राथमिकता और दूरदृष्टि का। क्या हम एक ऐसी व्यवस्था बनाना चाहते हैं, जहाँ उच्च प्रशिक्षित डॉक्टर राज्य छोड़कर बेहतर अवसरों की तलाश में बाहर चले जाएं? या फिर ऐसी व्यवस्था, जहाँ उन्हें सम्मान, स्थिरता और प्रोत्साहन मिले?
इतिहास गवाह है कि जब किसी भी व्यवस्था के मुख्य स्तंभ उपेक्षित होते हैं, तो उसका पतन निश्चित होता है। स्वास्थ्य व्यवस्था में डॉक्टर वही स्तंभ हैं। यदि उनकी समस्याओं को समय रहते नहीं सुलझाया गया, तो इसका परिणाम केवल एक हड़ताल नहीं होगा। यह पूरे सिस्टम के ठहर जाने की चेतावनी है।
एक संभावित हड़ताल का मतलब है, अस्पतालों में सेवाओं का ठप होना, मरीजों का भटकना, और आपातकालीन सेवाओं का प्रभावित होना। इसका सबसे बड़ा खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ेगा। इसलिए यह केवल डॉक्टरों का मुद्दा नहीं है; यह हर नागरिक का मुद्दा है।
सरकार के सामने आज एक स्पष्ट विकल्प है या तो वह इस बढ़ते असंतोष को समय रहते समझे और ठोस निर्णय ले, या फिर एक बड़े संकट का इंतजार करे। पीजी डॉक्टरों के स्टाइपेंड और बॉन्डेड डॉक्टरों के वेतन में तत्काल और यथोचित वृद्धि के साथ-साथ, सुपर स्पेशलिटी कैडर का गठन, डीएम/एमसीएच/डीआरएनबी डॉक्टरों के लिए अलग वेतनमान और स्पष्ट पद संरचना अब अत्यंत आवश्यक हो चुकी है।
डॉक्टर समाज संघर्ष से पीछे हटने वाला नहीं है, लेकिन यह संघर्ष किसी टकराव के लिए नहीं, बल्कि एक बेहतर और सशक्त स्वास्थ्य व्यवस्था के निर्माण के लिए है। यह मांग केवल आर्थिक नहीं है, यह सम्मान, समानता और भविष्य की मांग है।
आज यदि डॉक्टरों की आवाज सुनी जाती है, तो कल स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत होगी। लेकिन यदि यह आवाज अनसुनी रह गई, तो आने वाला समय केवल सवाल नहीं पूछेगा, जवाब भी मांगेगा।
लेखक: डॉ. हीरा सिंह लोधी
अध्यक्ष, छत्तीसगढ़ डॉक्टर फेडरेशन
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