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अपने ही शब्दों के घातक असर से कोई सबक नहीं!- सुनील कुमार

 Newsbaji  |  Jul 24, 2026 11:35 AM  | 
Last Updated : Jul 24, 2026 11:35 AM
अपने ही शब्दों के घाक असर से कोई सबक नहीं! – सुनील कुमार की टिप्पणी
अपने ही शब्दों के घाक असर से कोई सबक नहीं! – सुनील कुमार की टिप्पणी

टिप्पणी। अभी जब दिल्ली हाईकोर्ट से निराशा मिलने के बाद जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के बैनरतले एक व्यापक जनआंदोलन कर रहे छात्रों और नौजवानों के वकील ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की कि प्रदर्शनकारियों की पुलिस बुरी तरह पिटाई कर रही है, इसके वीडियो सुबूत मौजूद हैं, अगर अदालत चाहे तो वे सुबूत दिखाए जा सकते हैं, तो इस पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस अपील को सिरे से खारिज करते हुए कड़ी टिप्पणी की, और कहा अपना समय बर्बाद मत कीजिए, और हमारा समय भी बर्बाद मत कीजिए।

उन्होंने कहा कि हमें वीडियो में दिलचस्पी नहीं है, हमारे पास देखने का समय नहीं है। यह बात याद रखने की है कि यह आंदोलन नीट जैसी दाखिला इम्तिहान के पेपर आऊट के खिलाफ किया जा रहा है, लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी का यह नाम तो जस्टिस सूर्यकांत की ही एक टिप्पणी से उपजा हुआ है। उन्होंने 15 मई को एक अलग मामले की सुनवाई करते हुए कहा था- ‘समाज में पहले से ही ऐसे परजीवी मौजूद हैं जो व्यवस्था पर हमला करते हैं। कुछ युवा ऐसे हैं जो रोजगार नहीं मिलने, और पेशे में जगह न बना पाने के कारण कॉकरोच की तरह हर जगह फैल जाते हैं।’ जब इस टिप्पणी की बहुत आलोचना हुई तो उन्होंने सफाई दी और कहा कि उनकी बात को गलत तरीके से पेश किया गया।

अब हम दिल्ली में छात्रों के शांतिपूर्ण और अहिंसक, लोकतांत्रिक और जायज, और पूरी तरह से गैरराजनीतिक आंदोलन पर खुली पुलिस गुंडागर्दी को देखते हुए जब इन्हीं जस्टिस सूर्यकांत का यह ताजा रूख देखते हैं, तो हैरानी होती है कि दो महीने पहले के अपने शब्दों से उपजे इस आंदोलन की याचिका अदालत पहुंचने पर एक बार फिर उन्होंने संवेदनाशून्य शब्दों का इस्तेमाल किया है। जब सोशल मीडिया, और मीडिया का कुछ हिस्सा ऐसे वीडियो से भरा हुआ है जिसमें पुलिस बिना वर्दी के मुंह पर कपड़ा बांधे सिर पर हेलमेट लगाए, पुलिसिया प्लास्टिक-लाठी चलाते हुए निहत्थे छात्रों और नौजवानों को बुरी तरह पीट रही है, पुलिस का एक बड़ा अफसर मार खाकर निकलती हुई एक निहत्थी युवती के पिछवाड़े में लाठी ठूंसते हुए दिख रहा है, जब निहत्थी छात्राओं को घेरकर लाठियों से पीटा जा रहा है, तब दिल्ली हाईकोर्ट जाने पर वह भी तिलचट्टों की बात सुनने से इंकार कर दे रहा है, और उसके इंकार के पीछे की वजहों को समझा जा सकता है।

फिर जब यही मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचता है, और बेतहाशा पुलिस हिंसा के खिलाफ अदालत का ध्यान खींचा जाता है, तो मुख्य न्यायाधीश इसे अपने समय की बर्बादी कहते हैं, और वकील को सुझाते हैं कि वह भी अपना समय बर्बाद न करे। वे कहते हैं कि उन्हें वीडियो में दिलचस्पी नहीं है, उनके पास देखने का समय नहीं है। आज उन्हीं के शब्दों से आहत युवा पीढ़ी कॉकरोच बनकर जंतर-मंतर पर पूरी तरह लोकतांत्रिक आंदोलन कर रही है, और पुलिस घोषित और जाहिर तौर पर हिंसा कर रही है, तो चीफ जस्टिस के पास न समय है, न इस हिंसा के वीडियो-सुबूत देखने में उनकी दिलचस्पी है। यह देखकर हमारे जैसे हक्का-बक्का हुए लोग दो महीने पहले के उनके शब्द, और आज के उनके शब्द एक साथ रखकर देखने पर मजबूर हैं।

आज जब एमनेस्टी इंटरनेशनल, और ह्यूमन राइट्स वॉच जैसे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन इस आंदोलन पर पुलिस जुल्म के खिलाफ बयान जारी कर रहे हैं, जब दुनिया के अलग-अलग देशों में बिखरे हुए प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान इस आंदोलन को जायज ठहरा रहे हैं, और पुलिस कार्रवाई को पूरी तरह नाजायज, तो उस वक्त उसी शहर में कुछ किलोमीटर दूर बसा हुआ सुप्रीम कोर्ट इस मामले को देखने-सुनने में कोई दिलचस्पी नहीं रखता। कोई हैरानी नहीं है कि उसके पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने भी तिलचट्टों को सुनने से इंकार कर दिया था। हम इस एक जैसी बेरूखी को समझ रहे हैं, लेकिन क्या इससे न्यायपालिका के इतिहास में इन जजों का यह रूख सम्मान के साथ दर्ज होगा?

छात्रों और नौजवानों के जिस आंदोलन के लिए न सिर्फ हिन्दुस्तान, बल्कि दुनिया के अलग-अलग देशों से बेचेहरा और बेनाम लोग तरह-तरह के खानपान, टूथपेस्ट-टूथब्रश जैसे कई तरह के सामान का भुगतान करके उन्हें जंतर-मंतर पर डिलीवर करवा रहे हैं, जहां के मार खाए हुए नौजवानों के लिए आसपास की मस्जिदों और गुरुद्वारों ने अपने दरवाजे खोल दिए हैं, और लंगर चला रहे हैं, जहां भूखे पेट और मुंह से कई गुना अधिक खानपान लोग ला-लाकर छोड़ रहे हैं, देश की उस हवा से हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के एयरकंडीशंड कोर्टरूम अपने-आपको अछूता रख रहे हैं। हम न्यायपालिका को किसी नाजायज हवा से प्रभावित होने नहीं कह रहे, लेकिन उसी के शब्दों से आहत पूरी नौजवान पीढ़ी के इस तरह विचलित होने को देखने को जरूर कह रहे हैं। 

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश लोकतंत्र के तीन में से एक स्तंभ के सबसे अधिक ताकतवर व्यक्ति होते हैं, वे कुछ भी कह सकते हैं, वे कुछ भी कर सकते हैं। इसी सुप्रीम कोर्ट का यह इतिहास रहा है कि 2020 में जब अर्नब गोस्वामी नाम के एक नफरती टीवी जर्नलिस्ट की अंतरिम जमानत अर्जी बाम्बे हाईकोर्ट ने खारिज की थी, तो सुप्रीम कोर्ट ने आनन-फानन अगले ही दिन, मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई में अवकाशकालीन बेंच ने तुरंत सुनवाई की थी, और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर लंबा फलसफा लिखते हुए अंतरिम जमानत दी थी।

एक दूसरा केस याद पड़ता है जिसमें 2022 में पैगम्बर मोहम्मद पर टिप्पणी करने वाली नुपूर शर्मा की अर्जी पर अवकाशकालीन बेंच ने तुरंत सुनवाई करते हुए गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी। और सबसे ही दिलचस्प मामला तो अपने वक्त के मुख्य न्यायाधीश रहे रंजन गोगोई का था जिन पर सुप्रीम कोर्ट की ही एक महिला कर्मचारी ने यौन उत्पीडऩ का आरोप लगाया था, और 20 अप्रैल 2019 को सुप्रीम कोर्ट बंद रहने के बावजूद अचानक एक ‘अत्यंत सार्वजनिक महत्व की विशेष बेंच’ का गठन किया गया, गोगोई ने खुद इस बेंच की अध्यक्षता की, और आरोपों को न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला बताया। जिस पर यौन शोषण के आरोप लगे थे, जिसे कटघरे में होना था, वह खुद जज बनकर बैठा था, और उसके साथ दो दूसरे जज भी बैठे थे।

एक हैरतअंगेज बात यह थी कि यौन शोषण के आरोपों के इस मामले को इसी सुप्रीम कोर्ट ने इस आरोप के साथ सुनवाई के लिए दर्ज नहीं किया, बल्कि इस केस का नाम रखा गया- ‘न्यायपालिका की स्वतंत्रता से जुड़े अत्यंत सार्वजनिक महत्व के विषय’। इसे न्यायपालिका को अस्थिर करने की बड़ी साजिश बताया गया था।

जिस सुप्रीम कोर्ट का अपना आचरण हाल के बरसों में इस तरह का रहा है, जिसके अभी हाल के एक मुख्य न्यायाधीश डी.वाई.चन्द्रचूड़ अपने घर की गणेश पूजा को लेकर राजनीतिक आरोपों से घिरे थे, उस सुप्रीम कोर्ट के पास आज देश की राजधानी में निहत्थे और शांतिपूर्ण दसियों हजार नौजवानों पर गैरकानूनी तरीकों से पुलिस के हमले को सुनने और देखने का न समय है, न दिलचस्पी।

देश में कॉकरोचों को मारने वाली फैक्ट्रियों का कुल उत्पादन मिलाकर भी कॉकरोचों की इस नई पीढ़ी को नहीं मार पाएगा। और ऐसे कारखाने चाहे किसी लोकतांत्रिक संस्था या स्तंभ की शक्ल में ही क्यों न हों, उनके हमलों से भी ये कॉकरोच अपनी लोकतांत्रिक प्रतिरोधक क्षमता से बच जाएंगे। अपनी एयरकंडीशंड मीनारों में बैठे लोग अपनी फिक्र करें।

साभार: यह टिप्पणी वरिष्ठ पत्रकार सुनील कुमार, संपादक, दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ की फेसबुक पोस्ट से साभार ली गई है। 

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