उज्जैन। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने शुक्रवार को उज्जैन में आयोजित ‘युवा धर्म संसद’ में भारतीय ‘धर्म’ की अवधारणा को लेकर विस्तार से बात की। करीब 1,700 Gen Z युवाओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में ‘धर्म’ का अर्थ पश्चिमी अवधारणा वाले ‘Religion’ से अलग है। उनके मुताबिक धर्म केवल किसी विशेष पूजा-पद्धति या आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सत्य, करुणा, पवित्रता, आत्म-अनुशासन और कर्तव्य से जुड़ी व्यापक अवधारणा है।
धर्म और रिलीजन एक नहीं- मोहन भागवत
भागवत ने कहा कि, भारतीय संदर्भ में ‘धर्म’ और ‘रिलीजन’ को एक-दूसरे का पर्याय नहीं माना जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारतीय अवधारणा में धर्म व्यक्ति को कर्तव्य और जिम्मेदारी का बोध कराता है। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी भाषा में भारतीय अर्थों वाले ‘धर्म’ के लिए कोई सटीक शब्द नहीं है। ऐतिहासिक रूप से पश्चिमी लोगों को भारतीय अवधारणा समझाने के लिए ‘Religion’ शब्द का इस्तेमाल किया गया।
भागवत के अनुसार, जब ‘Religion’ को ‘धर्म’ से अलग करके देखा जाता है तो वह संकीर्ण या सांप्रदायिक स्वरूप ले सकता है। वहीं धर्म का आधार सत्य, करुणा, पवित्रता और आत्म-अनुशासन है।
धर्म खोजने की चीज नहीं, पहचानकर पालन करने की चीज
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि धर्म कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे बाहर जाकर खोजा जाए। इसे पहचानना और अपने जीवन में उसका पालन करना होता है। उन्होंने धर्म को ऐसे सिद्धांत के रूप में बताया जो ब्रह्मांड की व्यवस्था को बनाए रखने, सभी के विकास को बढ़ावा देने और हर जीव तथा वस्तु की प्रकृति के अनुरूप उसके कर्तव्यों को निर्धारित करने से जुड़ा है।
युवाओं से कहा कि, यदि वे धर्म की वास्तविक अवधारणा को समझना चाहते हैं तो उन्हें अपने पूर्वाग्रहों को छोड़ना होगा। उनके अनुसार धर्म इंसान के व्यवहार और उसके कर्तव्यों में दिखाई देता है।
पर्यावरण की रक्षा भी धर्म का हिस्सा
मोहन भागवत ने धर्म को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ते हुए कहा कि मनुष्य का दायित्व प्रकृति की रक्षा करना भी है। जंगलों को नष्ट करना और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाना ‘अधर्म’ है, क्योंकि प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी भी मानव कर्तव्य का हिस्सा है। युवाओं से अपनी परंपराओं पर कायम रहने के साथ-साथ दूसरी पूजा-पद्धतियों और आस्थाओं का सम्मान करने की अपील की।
भारत की परंपरा लोगों को जोड़ने वाली
भागवत ने कहा कि भारत की परंपरा लोगों को बांटने के बजाय जोड़ने का प्रयास करती रही है। उन्होंने कहा कि देश की सामाजिक व्यवस्था में अलग-अलग आस्थाओं और विचारों के बीच भेदभाव नहीं करने की भावना रही है।
उन्होंने इसे भारतीय संदर्भ में ‘पंथ-निरपेक्षता’ की समझ से जोड़ा। साथ ही उन्होंने कहा कि पश्चिमी देशों में धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा का विकास शासकों और धार्मिक अधिकारियों के बीच संघर्ष की ऐतिहासिक परिस्थितियों में हुआ था, इसलिए भारतीय संदर्भ को उसी नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए।
भौतिक और आध्यात्मिक जीवन को अलग नहीं मानता भारत
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि भारत ने परंपरागत रूप से जीवन के भौतिक और आध्यात्मिक पहलुओं को अलग-अलग करने के बजाय उन्हें एक साथ देखने की कोशिश की है। युवाओं से सफल होने के साथ-साथ उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने और ऐसी दुनिया के निर्माण में योगदान देने की अपील की, जहां खुशी और शांति का वातावरण हो।
युवा धर्म संसद में जुटे विद्वान और धार्मिक नेता
आयोजकों के मुताबिक, उज्जैन में आयोजित तीन दिवसीय युवा धर्म संसद का यह छठा संस्करण है। कार्यक्रम में करीब 300 विद्वान, शिक्षक, शोधकर्ता और धार्मिक नेता हिस्सा ले रहे हैं। इससे पहले युवा धर्म संसद का आयोजन काशी, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार और कांचीपुरम में किया जा चुका है। अगले वर्ष यह आयोजन द्वारका में प्रस्तावित है।
युवाओं के बीच संवाद पर जोर
उज्जैन में आयोजित यह कार्यक्रम ऐसे समय में हुआ है जब विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक विषयों पर युवाओं की भागीदारी और संवाद को लेकर चर्चा बढ़ी है। कार्यक्रम में Gen Z प्रतिभागियों की बड़ी संख्या रही। मोहन भागवत ने अपने संबोधन में युवाओं को धर्म की अवधारणा को पूर्वाग्रहों से अलग होकर समझने और उसे व्यवहार एवं जिम्मेदारी से जोड़कर देखने का संदेश दिया।
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