रायपुर। छत्तीसगढ़ विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत ने राज्य में अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी परिवारों के अधिकारों के कथित हनन का मामला राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के समक्ष उठाया है। उन्होंने राष्ट्रपति को पत्र भेजकर वन अधिकार अधिनियम, 2006 के प्रावधानों को प्रभावी ढंग से लागू कराने के लिए हस्तक्षेप की मांग की है।


नेता प्रतिपक्ष ने अपने पत्र में कहा है कि, अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 दिसंबर 2007 से पूरे देश में लागू है। अधिनियम की धारा 3(1)(घ) के तहत वन भूमि पर स्थित जलक्षेत्रों में मछली पालन और अन्य जलीय उत्पादों के उपयोग का सामुदायिक अधिकार स्थानीय पात्र व्यक्तियों और समुदायों को दिए जाने का प्रावधान है। उन्होंने आरोप लगाया कि छत्तीसगढ़ में पिछले 18 वर्षों से इस प्रावधान का पूर्ण रूप से क्रियान्वयन नहीं हो पाया है।
1.58 लाख हेक्टेयर जलक्षेत्र पर अधिकार का सवाल
डा. महंत के अनुसार, राज्य की वन भूमि पर लगभग 1.58 लाख हेक्टेयर जलक्षेत्र स्थित है, जहां मछली पालन और मत्स्याखेट से 50 हजार से अधिक आदिवासी और अन्य वन निवासी परिवार अपनी आजीविका चलाते हैं। उनका कहना है कि, वर्तमान मत्स्य नीति वन अधिकार अधिनियम की भावना के अनुरूप नहीं है।
उन्होंने आरोप लगाया कि, वन क्षेत्रों के जलाशयों को पट्टे पर देने और 1000 हेक्टेयर से बड़े जलाशयों के लिए निविदाएं जारी कर ठेकेदारों को सौंपने की व्यवस्था के कारण स्थानीय समुदाय अपने पारंपरिक अधिकारों से वंचित हो रहे हैं। इससे आदिवासी और वनवासी परिवार अपने ही क्षेत्रों में ठेकेदारों के अधीन मजदूर बनकर काम करने को मजबूर हैं।
राष्ट्रपति से राज्य सरकार को निर्देश देने की मांग
डॉ. महंत ने राष्ट्रपति से अनुरोध किया है कि, आदिवासियों और पारंपरिक वन निवासियों के आर्थिक एवं कानूनी हितों की रक्षा के लिए वन अधिकार अधिनियम की धारा 3(1)(घ) को तत्काल प्रभाव से लागू कराने हेतु छत्तीसगढ़ के राज्यपाल और मुख्यमंत्री को आवश्यक निर्देश जारी किए जाएं।
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि, यदि अधिनियम के प्रावधानों का सही तरीके से पालन किया जाए तो हजारों परिवारों को उनका वैधानिक और सामुदायिक अधिकार मिल सकेगा। साथ ही उन्होंने उम्मीद जताई कि राष्ट्रपति स्तर से पहल होने पर राज्य सरकार और प्रशासन इस मुद्दे पर गंभीरता से कार्रवाई करेंगे।
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