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हेमचंद यादव विश्वविद्यालय के कुलपति के खिलाफ शिकायतों की जांच तेज, दस्तावेजों की पड़ताल के लिए विश्वविद्यालय पहुंची जांच समिति

 Newsbaji  |  Sep 09, 2026 11:41 AM  | 
Last Updated : Sep 09, 2026 11:41 AM
हेमचंद यादव विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. डॉ. संजय तिवारी के विरुद्ध शिकायतों की जांच तेज
हेमचंद यादव विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. डॉ. संजय तिवारी के विरुद्ध शिकायतों की जांच तेज

दुर्ग। हेमचंद यादव विश्वविद्यालय, दुर्ग के कुलपति प्रो. (डॉ.) संजय तिवारी के विरुद्ध प्राप्त वित्तीय, प्रशासनिक एवं शैक्षणिक अनियमितताओं संबंधी शिकायतों की जांच अब निर्णायक चरण में पहुंचती दिखाई दे रही है। राज्यपाल सचिवालय द्वारा शिकायतों से संबंधित नस्तियां, नोटशीट एवं आवश्यक अभिलेख उपलब्ध कराने के लिए निर्धारित समय-सीमा समाप्त होने के बाद जांच समिति के सदस्यों के विश्वविद्यालय पहुंचने की जानकारी सामने आई है। बताया जा रहा है कि समिति द्वारा संबंधित दस्तावेजों एवं अभिलेखों की मौके पर जांच-पड़ताल की जा रही है।

इस घटनाक्रम के बाद विश्वविद्यालय के प्रशासनिक गलियारों में हलचल बढ़ गई है। खास तौर पर यह सवाल चर्चा में है कि राज्यपाल सचिवालय द्वारा कुलपति को स्पष्ट समय-सीमा में आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराने के निर्देश दिए जाने के बावजूद समिति को स्वयं विश्वविद्यालय पहुंचकर अभिलेखों की पड़ताल क्यों करनी पड़ी।

राज्यपाल ने गठित की थी उच्चस्तरीय जांच समिति
कुलपति प्रो. (डॉ.) संजय तिवारी के विरुद्ध प्राप्त शिकायतों की गंभीरता को देखते हुए छत्तीसगढ़ के राज्यपाल एवं विश्वविद्यालय के कुलाधिपति की ओर से उच्चस्तरीय जांच समिति गठित की गई थी। राज्यपाल के सचिव डॉ. सी.आर. प्रसन्ना द्वारा 30 जुलाई 2026 को इस संबंध में आदेश जारी किए जाने की जानकारी है।

बताया जाता है कि, दुर्ग ग्रामीण के विधायक एवं छत्तीसगढ़ राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष ललित चंद्राकर ने कुलपति के विरुद्ध विभिन्न बिंदुओं को लेकर कुलाधिपति के समक्ष शिकायत प्रस्तुत की थी। इसके बाद शिकायतों की जांच की प्रक्रिया प्रारंभ हुई।

24 अगस्त तक मांगे गए थे दस्तावेज
विश्वविद्यालय सूत्रों के अनुसार, राज्यपाल सचिवालय की ओर से 19 अगस्त 2026 को जारी पत्र के माध्यम से कुलपति के विरुद्ध प्राप्त शिकायतों की जांच के लिए आवश्यक दस्तावेज, नस्तियां एवं अभिलेख जांच समिति को उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए थे। इसके लिए 24 अगस्त 2026 तक की समय-सीमा निर्धारित की गई थी।

बताया जाता है कि, कुलपति की ओर से विभिन्न विभागों से अभिलेख एकत्र किए जाने तथा उच्च शिक्षा विभाग से संबंधित जानकारी प्राप्त करने के लिए आरटीआई आवेदन किए जाने का हवाला देते हुए समय-सीमा को बढ़ाकर 31 अगस्त 2026 किए जाने का अनुरोध किया गया था। हालांकि, निर्धारित अवधि बीतने के बाद भी अपेक्षित दस्तावेज जांच समिति के समक्ष पूरी तरह प्रस्तुत किए गए या नहीं, इसे लेकर अब सवाल उठ रहे हैं।

12 लाख से अधिक उत्तरपुस्तिकाओं की खरीदी पर सवाल
शिकायत में विश्वविद्यालय द्वारा मार्च 2026 में लगभग 12 लाख से अधिक उत्तरपुस्तिकाओं की खरीदी के लिए निविदा प्रक्रिया अपनाए जाने का उल्लेख किया गया है। शिकायतकर्ता की ओर से आरोप लगाया गया है कि निविदा प्रक्रिया में शासकीय फर्म ‘संवाद’ द्वारा न्यूनतम दर प्रस्तुत किए जाने के बावजूद कुलपति की ओर से एक निजी फर्म के पक्ष में अर्धशासकीय पत्र जारी कर कार्य आवंटित किए जाने की अनुशंसा की गई। इसके बाद कथित रूप से उसी निजी फर्म को कार्य दिया गया और लगभग 40 लाख रुपये से अधिक का भुगतान किया गया।

शिकायत में इस पूरी प्रक्रिया को शासकीय निविदा एवं वित्तीय नियमों के विपरीत बताया गया है। हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि अथवा खंडन जांच समिति की जांच और संबंधित अभिलेखों के परीक्षण के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।

नए पाठ्यक्रमों की अनुमति और मान्यता भी जांच के दायरे में
शिकायत में विश्वविद्यालय द्वारा MBA, MCA, PGDBM सहित 8 नए पाठ्यक्रम प्रारंभ किए जाने से संबंधित प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए हैं। शिकायत के अनुसार, इन पाठ्यक्रमों के लिए AICTE एवं RCI से निरीक्षण कराया गया, जबकि इससे पहले राज्य शासन से आवश्यक अनुमति प्राप्त किए जाने का दावा नहीं किया गया है। साथ ही आरोप है कि एक ही विभागीय संरचना को परिवर्तित स्वरूप में प्रस्तुत कर विभिन्न पाठ्यक्रमों के लिए मान्यता प्राप्त करने का प्रयास किया गया। इन आरोपों की वास्तविक स्थिति संबंधित स्वीकृतियों, निरीक्षण रिपोर्ट और विश्वविद्यालय के अभिलेखों की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

करीब 40 लाख की पुस्तकों की खरीदी पर भी उठे सवाल
नए पाठ्यक्रमों के लिए आवश्यक पुस्तकों की खरीदी को लेकर भी शिकायत में गंभीर आरोप लगाए गए हैं। शिकायतकर्ता के अनुसार, बिना विधिवत निविदा प्रक्रिया के मौखिक निर्देश पर लगभग 40 लाख रुपए मूल्य की करीब 380 पुस्तकों की तत्काल खरीदी की गई।

शिकायत में पुस्तकों की कीमत, चयन प्रक्रिया, खरीदी की आवश्यकता और वित्तीय स्वीकृति सहित कई बिंदुओं पर सवाल उठाए गए हैं। जांच समिति द्वारा यदि संबंधित क्रय फाइल, स्वीकृति, बिल, भुगतान अभिलेख और पुस्तक सूची की जांच की जाती है तो इस मामले की वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है।

प्रवेश से पहले अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति का आरोप
शिकायत में अतिथि व्याख्याताओं की नियुक्ति को लेकर भी प्रश्न उठाए गए हैं। आरोप है कि शैक्षणिक सत्र शुरू होने से पहले ही मई 2026 में पांच विषयों के लिए 15 अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति कर दी गई। शिकायतकर्ता का दावा है कि, संबंधित विभाग उस समय विधिवत अस्तित्व में नहीं थे और उनमें विद्यार्थियों का प्रवेश भी नहीं हुआ था। ऐसे में नियुक्तियों की आवश्यकता, उनके वेतन भुगतान के स्रोत और नियुक्ति प्रक्रिया की वैधानिकता की जांच किए जाने की मांग की गई है।

कार्यपरिषद की स्वीकृति को लेकर भी सवाल
कुलपति पर विश्वविद्यालय के महत्वपूर्ण वित्तीय एवं प्रशासनिक मामलों को कार्यपरिषद के समक्ष अनुमोदन के लिए प्रस्तुत नहीं करने का आरोप भी शिकायत में लगाया गया है।

शिकायतकर्ता के अनुसार, निर्धारित सीमा से अधिक राशि की खरीदी एवं महत्वपूर्ण वित्तीय निर्णयों में कार्यपरिषद की स्वीकृति आवश्यक होती है। ऐसे में यह जांच का विषय होगा कि विश्वविद्यालय में किए गए संबंधित वित्तीय निर्णयों के लिए निर्धारित वैधानिक एवं प्रशासनिक प्रक्रिया का पालन किया गया था या नहीं।

फिलहाल शिकायतों में लगाए गए आरोपों को जांच में सिद्ध तथ्य नहीं माना जा सकता। इनकी वास्तविकता जांच समिति की रिपोर्ट और संबंधित अभिलेखों के परीक्षण के बाद ही स्पष्ट होगी। कुलपति प्रो. (डॉ.) संजय तिवारी अथवा विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से इन आरोपों पर कोई विस्तृत आधिकारिक पक्ष सामने आता है तो उसे भी रिपोर्ट में शामिल किया जाना आवश्यक होगा।

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