दंतेवाड़ा/जगदलपुर। विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा की ऐतिहासिक एवं महत्वपूर्ण रस्म ‘मावली परघाव’ में शामिल होने के लिए आराध्य देवी मां दंतेश्वरी की पावन डोली और राजछत्र रविवार को दंतेवाड़ा से जगदलपुर के लिए रवाना हो गए। शारदीय नवरात्र की अष्टमी के पावन अवसर पर मां की डोली को गाजे-बाजे, पारंपरिक वाद्य यंत्रों, लोकनृत्य और गगनभेदी जयकारों के बीच भावभीनी विदाई दी गई। इस दौरान पूरा दंतेवाड़ा भक्तिरस में सराबोर नजर आया और श्रद्धालुओं की भारी भीड़ ने मां के प्रति अपनी अटूट आस्था प्रकट की।
जयकारों और पारंपरिक वाद्य यंत्रों से गूंज उठा दंतेवाड़ा
मां दंतेश्वरी की पावन डोली की विदाई के अवसर पर दंतेवाड़ा में उत्सव और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिला। हजारों श्रद्धालु मां के जयकारे लगाते हुए यात्रा में शामिल हुए। पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज, लोकनृत्य की मनमोहक प्रस्तुतियों और भक्तों की अगाध श्रद्धा ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।

मंदिर के मुख्य द्वार पर पुलिस बल ने सलामी देकर मां दंतेश्वरी को सम्मान अर्पित किया। धार्मिक आस्था के साथ राजपरंपरा और स्थानीय संस्कृति से जुड़े इस आयोजन ने एक बार फिर बस्तर की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को जीवंत कर दिया।
करीब 800 वर्षों से जीवंत है मावली परघाव की परंपरा
बस्तर दशहरा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि यहां की समृद्ध आदिवासी संस्कृति, लोकआस्था और ऐतिहासिक राजपरंपरा का अनूठा प्रतीक है। इसी उत्सव की सबसे महत्वपूर्ण रस्मों में शामिल है ‘मावली परघाव’, जिसकी परंपरा लगभग 800 वर्षों से चली आ रही है।
इस परंपरा के अंतर्गत मां दंतेश्वरी की डोली दंतेवाड़ा से जगदलपुर पहुंचती है। यहां बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी का मावली माता से पारंपरिक मिलन होता है। यह आयोजन देवी-आस्था के साथ बस्तर की सांस्कृतिक एकजुटता, ऐतिहासिक विरासत और जनजातीय परंपराओं की निरंतरता का संदेश देता है।

मावली परघाव की रस्म बस्तरवासियों के लिए विशेष धार्मिक और भावनात्मक महत्व रखती है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही इस परंपरा में स्थानीय समाज की सहभागिता बस्तर की सांस्कृतिक जड़ों की मजबूती को दर्शाती है।
निर्धारित पड़ावों से होते हुए जगदलपुर पहुंचेगी डोली
दंतेवाड़ा से रवाना हुई मां दंतेश्वरी की डोली निर्धारित पूजा स्थलों पर परंपरानुसार रुकते हुए जगदलपुर पहुंचेगी। यहां बस्तर दशहरा के अंतर्गत निर्धारित धार्मिक अनुष्ठानों और ऐतिहासिक परंपराओं का निर्वहन किया जाएगा। कार्यक्रम के अनुसार, मां दंतेश्वरी की डोली और राजछत्र 27 अक्टूबर को वापस दंतेवाड़ा के लिए रवाना होंगे।
मां दंतेश्वरी की इस यात्रा के साथ बस्तर में आस्था, परंपरा और संस्कृति का उत्सव और अधिक जीवंत हो उठा है। मावली परघाव के माध्यम से बस्तर की ऐतिहासिक विरासत न केवल संरक्षित हो रही है, बल्कि नई पीढ़ी तक भी पहुंच रही है।
मां दंतेश्वरी की पावन डोली की यह यात्रा बस्तर की उस सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है, जहां लोकआस्था, जनजातीय परंपराएं और ऐतिहासिक विरासत एक सूत्र में बंधकर सदियों पुरानी परंपराओं को आज भी जीवंत बनाए हुए हैं।
अखिलेश यादव ने चला बड़ा सियासी दांव! संविधान दिवस पर आएगा ‘PDA का प्रणपत्र’, BJP की बढ़ेगी चुनौती?
Copyright © 2021 Newsbaji || Website Design by Ayodhya Webosoft