रायपुर। छत्तीसगढ़ में आदिम जाति कल्याण विभाग का नाम बदलकर 'जनजाति कल्याण विभाग' किए जाने के फैसले पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने भाजपा सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि सरकार आदिवासी समाज की अस्मिता, पहचान और भावनाओं की अनदेखी कर रही है। यदि सरकार वास्तव में आदिवासी समाज के कल्याण के लिए प्रतिबद्ध है, तो उसे विभाग का नाम बदलने की राजनीति करने के बजाय बजट बढ़ाने और नई जनकल्याणकारी योजनाएं शुरू करने पर ध्यान देना चाहिए।
दीपक बैज ने आरोप लगाया कि, भाजपा सरकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की विचारधारा के प्रभाव में आदिवासी संस्कृति और विशिष्ट पहचान को कमजोर करने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि आदिवासियों की अलग सांस्कृतिक पहचान का सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन सरकार के फैसले इसके विपरीत दिखाई दे रहे हैं।
नाम बदलने से शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की समस्या हल नहीं होगी
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि, छत्तीसगढ़ की पहचान यहां के आदिवासी समाज, उसकी समृद्ध संस्कृति, परंपराओं, भाषा और विशिष्ट जीवनशैली से है। आदिवासी समाज की पहचान और भावनाओं का सम्मान करना सरकार की जिम्मेदारी है। केवल विभाग का नाम बदलने से आदिवासी परिवारों की शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और आर्थिक स्थिति में सुधार नहीं होगा।
उन्होंने सरकार से सवाल किया कि विभाग का नाम बदलने से आदिवासी परिवारों को वास्तविक रूप से क्या लाभ मिलेगा? बैज ने कहा कि सरकार को नाम परिवर्तन के बजाय ऐसे ठोस कदम उठाने चाहिए, जिनका लाभ आदिवासी समाज के जीवन में दिखाई दे।
कांग्रेस सरकार के कार्यों का किया उल्लेख
पीसीसी चीफ, दीपक बैज ने पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के कार्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि कांग्रेस शासनकाल में आदिवासी समुदाय के आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए थे। उनके मुताबिक, समर्थन मूल्य पर संग्रहण की व्यवस्था में शामिल वनोपजों की संख्या 7 से बढ़ाकर 74 की गई थी। इसके साथ ही वनोपजों के मूल्य संवर्धन, प्रसंस्करण, सी-मार्ट के माध्यम से बिक्री और लाभांश में हिस्सेदारी जैसी व्यवस्थाओं को बढ़ावा दिया गया था।
कांग्रेस सरकार ने देवगुड़ी और घोटुल जैसे धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्थलों के संरक्षण और संवर्धन के लिए भी काम किया। इसके अलावा आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पेयजल, सड़क और रोजगार के अवसर बढ़ाने की दिशा में पहल की गई थी।
जल, जंगल और जमीन के अधिकारों को लेकर उठाए सवाल
उन्होंने आरोप लगाया कि, भाजपा सरकार के कार्यकाल में आदिवासी समाज उपेक्षा का सामना कर रहा है। उन्होंने कहा कि, आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन से जुड़े अधिकार प्रभावित हो रहे हैं तथा वन अधिकार अधिनियम के तहत जारी पट्टों के रिकॉर्ड गायब होने की शिकायतें सामने आ रही हैं। बैज ने आरोप लगाया कि सरकार इन मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए विभाग का नाम बदलने जैसे फैसले कर रही है।
आदिवासी समाज के संवैधानिक और वन अधिकारों की रक्षा करना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। साथ ही, विश्व आदिवासी दिवस के आयोजन और आदिवासी समाज को सम्मान देने जैसे विषयों पर सरकार की प्रतिबद्धता भी उसके वास्तविक कार्यों से दिखाई देनी चाहिए।
छात्रवृत्ति, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं पर ध्यान देने की मांग
सरकार को आदिवासी बच्चों की शिक्षा, छात्रावासों की सुविधाओं, छात्रवृत्ति और युवाओं के रोजगार पर विशेष ध्यान देना चाहिए। दूरस्थ आदिवासी अंचलों में बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं, पेयजल, बिजली और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए पर्याप्त बजट दिया जाना चाहिए।
उन्होंने लंबित विकास योजनाओं को समय पर पूरा करने और वन अधिकारों सहित आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों को प्रभावी ढंग से लागू करने की मांग भी की।
‘आदिवासी समाज को नाम नहीं, जीवन में बदलाव चाहिए’
आदिवासी समाज को नाम बदलने की नहीं, बल्कि उसके जीवन में वास्तविक बदलाव की जरूरत है। भाजपा सरकार को आदिवासी अस्मिता और सम्मान से जुड़े विषयों पर राजनीति करने के बजाय शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और विकास के क्षेत्र में ठोस काम करके अपनी प्रतिबद्धता साबित करनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज के हित में सरकार के फैसलों का आकलन नाम परिवर्तन से नहीं, बल्कि इस बात से होना चाहिए कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आर्थिक सशक्तीकरण और बुनियादी सुविधाओं के क्षेत्र में लोगों को कितना लाभ मिला है।
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