बाराबंकी। आपने एक कहावत सुनी होगी कि "हिम्मत-ए-मर्दा तो मदद-ए-खुदा" कहते हैं कि हिम्मत वाले की मदद खुदा भी करता है। जिनके इरादे पक्के होते हैं वह अपनी मंजिल तक भी जरूर पहुंचता हैं। ऐसी ही कुछ कहानी बाराबंकी के शशांक की है। किसान के बेटे शशांक को बचपन में ही पोलियो हो गया था। पोलियो ने शशांक को दोनों पैरों से लाचार बना दिया, लेकिन उनके हौसलों को पोलियो तनिक भी डिगा नहीं पाया। पोलियो हौसलों को लाचार नहीं बना पाया। शशांक ने ब्राजील इंटरनेशनल पैरा बैडमिंटन टूर्नामेंट में अपनी मिक्स डबल पार्टनर अम्मू मोहन के साथ ब्रॉन्ज मेडल जीतकर यह साबित भी कर दिया। यह एक इंटरनेशनल रैंकिंग टूर्नामेंट था। इसमें प्रतिभाग करने वाले सभी खिलाड़ी आगामी वर्ल्ड चैंपियनशिप एवं एशियन गेम्स के लिए क्वालीफाई करेंगे।

हौसलों की उड़ान
जिस बैडमिंटन के गेम को बेडौल शरीर वाले खुद को चुस्त फूर्त बनाकर सुडौल बनाते हैं। शशांक उस गेम को स्पोर्ट्स व्हीलचेयर के सहारे खेलते हैं और वह भी इतना अच्छा, इतनी सफाई से कि कोई आम खिलाड़ी क्या खेलता होगा। शशांक कुमार अभी विश्व में 24वें पायदान पर हैं। ब्राज़ील के सौ पाउलो शहर में हुए इस टूर्नामेंट में बाराबंकी जिले के हैदरगढ़ तहसील के निवासी खिलाड़ी शशांक कुमार ने ब्रॉन्ज मेडल जीता है। यहां आपको बता दें कि बैडमिंटन के रैकेट और शटल से सामंजस्य बिठाने के लिए जिन पैरों की फुर्ती की जरूरत होती है वो भले ही बेजान हो,लेकिन शशांक ने बैडमिंटन में तमाम तमाम मेडल्स जीतकर साबित कर दिया कि जान किसी अंग में नहीं, हौसलों में होती है।
कई खिताब उनके नाम
शशांक को 4 साल की उम्र में पोलियो हुआ था। इसके चलते उनके पैर लाचार हो गए, लेकिन इस लाचारी को उन्होंने अपनी ताकत बना लिया। इसके साथ ही अपने शौक बैडमिंटन से ही जिंदगी को नई दिशा देने में जुट गए। आज शशांक पैरा बैडमिंटन की सबसे कठिन कैटेगरी व्हीलचेयर–1 में खेलते हैं। शशांक अब तक 9 राष्ट्रीय और 4 अंतरराष्ट्रीय मैचों में हिस्सा लेकर देश के लिए 1 रजत, 1 ब्रॉन्ज पदक और प्रदेश के लिए 1 स्वर्ण, 4 रजत और 5 कास्य के साथ कुल 12 पदक जीत चुके हैं।

इच्छाशक्ति को करें मजबूत
यानी शशांक उन लोगों के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं, जो जरा सी मुश्किल में जिंदगी जीना तो दूर जिंदगी से ही नाता तोड़ने का गलत फैसला ले लेते हैं। थोड़ी सी परेशानी से जिंदगी में मायूस होने वालों के लिए शशांक एक हौसला हैं। शशांक के पास न तो पैसा है और न ही स्वस्थ शरीर। अगर है तो सिर्फ दुनिया में कुछ कर गुजरने की इच्छा और इच्छा को पूरा करने के लिए जज्बा। वर्तमान में शशांक लखनऊ में रहकर भारतीय पैरा बैडमिंटन टीम के कोच और द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित गौरव खन्ना के पास उनकी अकादमी में प्रैक्टिस करते हैं।
इनपुट- अनिरुद्ध शुक्ला
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