रायपुर. डीआरजी यानी डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड (DRG) ये वही जवान हैं जिनमें से 10 जवान 26 अप्रैल 2023 को छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में शहीद हो गए. ये वो जवान हैं, जो बस्तर के जंगल, पहाड़ और मैदान के बीच पले-बढ़े और बड़े हुए हैं. बस्तर और उसके जंगल के रग-रग से वाकिफ हैं. पराक्रम ऐसा कि नक्सलियों से दो-चार होने और उन्हें मार गिराने में दक्ष. नक्सलियों से मुकाबला करने के लिए उन्हीं की तरह गोरिल्ला वार में दक्ष. यहां की परिस्थितियों में पहले से ढले हुए ये बस्तर में पुलिस और फोर्स की अग्र पंक्ति के जवान होते हैं, जिनसे नक्सली भी कांपते हैं. इसीलिए उनके निशाने पर भी रहते हैं. सूचना तंत्र भी तगड़ा.
साल 2008, जब नक्सलियों के खात्मे के लिए एक बड़ा निर्णय लिया गया. तब अर्धसैनिक बलों की आमद इस क्षेत्र में हो चुकी थी. पुलिस थानों तक ही सीमित रह सकती थी या बड़ी घटना के बाद ही पहुंच पाती थी. यहां तैनात अर्धसैनिक बलों के जवानों की वार में दक्षता और साहस तो कुछ कम नहीं था, लेकिन परिस्थितियां उनके अनुकूल नहीं थीं. आमतौर पर नक्सली इसी बस्तर क्षेत्र के होते थे, जो जंगल की पूरी जानकारी रखते. अपनी रणनीति के तहत गोरल्ला वार करते, जवानों को मारते और जंगल में छिप जाते.
उसी साल ये रणनीति बनाई गई कि नक्सलियों के खात्मे के लिए उनके ही बीच पले-बढ़े, उनके द्वारा सताए परिवारों के नौजवानों की भर्ती की जाए. इसी से शुरुआत हुई डीआरजी यानी डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड की. शुरुआत कांकेर व नारायणपुर जिले में की गई. स्थानीय युवाओं की भर्ती में कई तरह की छूट भी दी गई ताकि उनके चयन में छोटी-मोटी कमियां बाधा न बने. फिर धीरे-धीरे इसका विस्तार होता गया. साल 2013 में बीजापुर और फिर बस्तर में डीआरजी का गठन हुआ. वहीं वर्ष 2014 में सुकमा तो 2015 में कोंडागांव और दंतेवाड़ा में ये फोर्स गठित हुई.
स्थानीय युवाओं के साथ आत्मसमर्पित नक्सली भी शामिल
बता दें कि डीआरजी में स्थानीय युवकों को शामिल तो किया ही जाता है, साथ ही आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में शामिल होने वाले पूर्व नक्सलियों को भी इसमें शामिल किया जाता है. ये न सिर्फ यहां की भाषा जानते हैं बल्कि आम लोगों के बीच उनकी पकड़ भी मजबूत होती है. स्थानीय आदिवासी समुदायों से सीधे जुड़ाव रखने का भी बड़ा लाभ मिलता है.
विश्वास जीतने में भी सफलता
पहले के दौर में पुलिस व अर्धसैनिक बलों के जवान बाहरी होते थे. ऐसे में नक्सली स्थानीय आदिवासियों को बरगलाने के लिए कहते थे कि वे उनके अपने हैं और ये बाहरी लोग उनके हित के लिए कुछ नहीं करेंगे. बल्कि हमें आपस में लड़ाएंगे. सरकार के लिए भी विश्वास बहाली में बड़ी दिक्कतें थीं. लेकिन, डीआरजी के अस्तित्व में आने के बाद आदिवासियों की इस सोच में काफी बदलाव आया. नक्सलियों के मंसूबों पर पानी फिरना शुरू हुआ.
जवानों के आक्रोश को ऐसे भुनाया
बता दें कि डीआरजी के जवानों में से कई ऐसे भी हैं, जिनके परिवारों को नक्सलियों के कोप का भाजन बनना पड़ा. पुलिस की मुखबीरी के शक पर कई परिवारों को ही या परिवार के सदस्यों को मार डाला गया. इससे इन जवानों में स्वत: ही नक्सलियों से नफरत है. ऐसे में उन्हें नक्सलियों के खिलाफ प्रेरणा देने की भी जरूरत नहीं है. ये खुद ही उन्हें अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानते हैं.
गुरिल्ला वार के चलते नक्सली खाते हैं खौफ
पहले नक्सलियों के भारी पड़ने की वजह उनका सूचना-तंत्र व गुरिल्ला वार हुआ करता था. लेकिन, डीआरजी के जवानों ने उनके ही हथियार को उन्हीं पर आजमाना शुरू किया. वे भी गुरिल्ला वार कर नक्सलियों का खात्मा करने लगे. यही नहीं, डीआरजी के जवानों को अलग से ट्रेनिंग भी दी गई. इस तरह ये अर्धसैनिक बलों के प्रमुख सहयोगी और आगे चलने वाले बन गए. न सिर्फ नक्सलियों के बराबर का युद्ध कौशल रखते हैं, बल्कि अलग से मिली आर्मी ट्रेनिंग से ये नक्सलियों से कहीं अधिक भारी पड़ने वाले बन गए.
नक्सलियों के होते हैं टारगेट में
नक्सली डीआरजी जवानों की ताकत को जान चुके हैं. उनका सबसे ज्यादा नुकसान डीआरजी के जवानों ने ही किया है. यही वजह है कि नक्सली भी सबसे ज्यादा डीआरजी के जवानों को ही निशाना बनाना चाहते हैं. यही वजह है कि वे उन पर ज्यादा वार करते हैं और उनकी शहादत की खबरें ही ज्यादा आती हैं. हालांकि ये बात और है कि सर्चिंग और मुठभेड़ में जो नक्सली मारे जा रहे हैं अधिकांश मुहिम में डीआरजी के जवान ही इसे अंजाम देते हैं.
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