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डॉ. राम कुमार द्विवेदी: जीवन जो मिशाल बन गया! भोला जी की कलम से

 Newsbaji  |  Sep 25, 2025 01:30 PM  | 
Last Updated : Sep 25, 2025 01:30 PM
डॉ. राम कुमार द्विवेदी के जीवन पर प्रेरणादायक विशेष लेख
डॉ. राम कुमार द्विवेदी के जीवन पर प्रेरणादायक विशेष लेख

चिट्ठीबाजी। उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर स्थित  मुस्लिम बहुल महानपुर गांव में वर्ष 1980 के दशक के उत्तरार्ध में जब समाज में सांप्रदायिकता का ताप दिखाई देने लगा था, तब गांव ने एक ऐसी मिसाल पेश की जिसे आज भी याद किया जाता है। लखनऊ-वाराणसी राजमार्ग पर स्थित इस गांव के लोगों ने जाति-धर्म से ऊपर उठकर डॉ. रामकुमार द्विवेदी को अपना प्रधान चुना, उन्हें सचमुच अपनी पलकों पर बिठाया। वे केवल ग्राम प्रधान नहीं बने, बल्कि गांव के हर घर के भरोसे का नाम बन गए।

सरकारी नौकरी छोड़कर सेवा का मार्ग
डॉ. द्विवेदी ने स्वास्थ्य विभाग में स्थायी, सुरक्षित सरकारी नौकरी छोड़कर मरीजों की सेवा को ही अपना जीवन बनाया। आज से लगभग 60 वर्ष पूर्व उन्होंने हनुमानगंज में निजी क्लीनिक खोली, जो धीरे-धीरे आसपास के जिलों के लिए भी आशा का केंद्र बन गई। लोग रोते-सिसकते आते, और उनकी दवा और दुआओं के बाद मुस्कराते हुए जाते।

दवा के साथ दुआ
वे केवल औषधि देने वाले चिकित्सक नहीं थे, वे ‘मरीज के मन’ को भी दुरुस्त करने वाले डाक्टर थे। दवा के साथ दुआ, संवेदनशीलता और सच्ची नीयत, यही उनका मंत्र था। वे पैसा कमाने के लिए दवा नहीं देते थे, बल्कि रोगी को स्वस्थ करने के लिए देते थे। यही कारण था कि दर्जनों डॉक्टर होने के बावजूद सबसे अधिक लोकप्रियता डॉ. रामकुमार द्विवेदी की थी।
वे पहले नाड़ी पकड़ कर, हाथ थाम कर देखते कि यह रोगी किस हालत में है, क्या मैं इसे ठीक कर पाऊंगा। यदि विश्वास होता, तभी दवा देते। यदि नहीं, तो साफ-साफ कहते, “फिलहाल यह बढ़िया दवा है, लेकिन आप बड़े अस्पताल भी दिखाइए।” लोग कहते थे, उनके हाथ में ‘यश’ था, इसीलिए 99 प्रतिशत मरीज ठीक हो जाते थे। असल वजह थी उनका प्रेम, उनकी ईमानदारी और संवेदनशीलता।

येज़दी मोटरसाइकिल की आहट
70 और 80 के दशक में जब लोगों के पास साइकिल भी मुश्किल से होती थी, तब उनकी यज़दी मोटरसाइकिल पूरे क्षेत्र की पहचान बन गई। उस दौर में लखनऊ–वाराणसी मार्ग आज की तरह चौड़ा नहीं, बल्कि सिंगल लेन था। यदा-कदा कोई ट्रक गुजरता, जिनमें बजते गाने 200 मीटर दूर तक सुनाई देते। शामें शांत और हवादार होतीं।

गांव से डेढ़ किलोमीटर दूर हनुमानगंज स्थित क्लिनिक से जब वे लौटते, तो आधे रास्ते से ही यज़दी की गड़गड़ाहट सुनाई दे जाती। घर के बच्चे अलर्ट हो जाते,“बाबूजी आ रहे हैं, टॉफ़ी-बिस्किट मिलेगा।”जो मरीज हनुमानगंज नहीं जा पाते थे, उनके लिए भी यज़दी की आवाज़ एक अलार्म थी कि “डॉक्टर साहब गांव पहुंच गए हैं।” उनके घर पहुंचने पर छिटपुट मरीजों की भीड़ लग जाती। बाद में उन्होंने एम्बेसडर कार भी खरीदी, पर उनकी सादगी और उपलब्धता वहीं रही।

ग्राम प्रधान के रूप में विकास पुरुष
महानपुर गांव में विकास की पहली ईंट उनके प्रधान बनने के बाद ही रखी गई। बिजली, खड़ंजा, नालियां, स्कूल के लिए जमीन आवंटन, तालाब का पट्टा, गरीबों के लिए कॉलोनी का निर्माण, भूमिहीन किसानों को जमीन आवंटन जैसे अनेक कार्य उन्होंने कराए। चिकित्सा क्षेत्र की तरह सार्वजनिक पद पर भी उन्होंने ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा को प्राथमिकता दी।
विरोध और साजिशें भी झेलीं, हमले तक की कोशिश हुई, अविश्वास प्रस्ताव लाया गया। अंततः कार्य में धांधली का आरोप लगाकर जिला अधिकारी को शिकायत दी गई। पहली बार जिले का बड़ा अधिकारी पूरे सरकारी अमले के साथ महानपुर आया, जांच की और सब सही पाकर उनकी ईमानदारी की प्रशंसा की। प्रस्ताव भेजा गया कि महानपुर को आदर्श ग्राम पंचायत नामित किया जाए।

सांस्कृतिक चेतना के अग्रदूत
क्षेत्रीय स्तर पर सांस्कृतिक आंदोलनों के भी वे अग्रदूत थे। विकवाजितपुर की आदर्श रामलीला कमेटी के वे 50 वर्षों तक जीवन पर्यन्त प्रबंधक रहे। दीपावली के पहले रविवार व सोमवार को यहां रामलीला होती और दो दिनों तक क्षेत्र का सबसे बड़ा मेला लगता। इसके साथ ही हनुमानगंज बाजार में नवरात्रि के पावन पर्व पर दुर्गा पंडाल की परंपरा भी उन्होंने ही शुरू कराई। आज यह परंपरा भरे-पूरे मेले में बदल चुकी है, जहां हर नवरात्रि चार से अधिक दुर्गा पंडाल सजते हैं।

क्षेत्र में शैक्षिक क्रांति के अगुआ 
सुल्तानपुर, हनुमानगंज क्षेत्र के ग्रामीण अंचल में शिक्षा के विस्तार के लिए डॉ. रामकुमार द्विवेदी का योगदान ऐतिहासिक रहा है। सुल्तानपुर जनपद में शिक्षा को नई दिशा देने वाले पंडित रामकिशोर त्रिपाठी के मार्गदर्शन और स्थानीय सहयोगियों रामलखन वर्मा सहित अन्य समाजसेवियों के साथ मिलकर उन्होंने बतौर संस्थापक सदस्य बाबा भगवानदास आदर्श विद्यालय, विकवाजितपुर की नींव रखी। आज यह विद्यालय एक विकसित इंटर कॉलेज के रूप में क्षेत्र के हजारों बच्चों को शिक्षा प्रदान कर रहा है।

समय के साथ इस विद्यालय के प्रबंधन में वर्चस्व को लेकर विवादशुरु हुआ, किन्तु डॉ. द्विवेदी ने सदैव संस्थान को समाज की भलाई के लिए देखा। उन्होंने विद्यालय के दैनिक प्रबंधन में स्वयं को अलग रखा और स्पष्ट कहा “मेरा कार्य विद्यालय की स्थापना तक था, ताकि क्षेत्र के बच्चे शिक्षित हों। यह विद्यालय निरंतर चलता रहे है यही कामना है।”

डॉ. द्विवेदी का शिक्षा क्षेत्र में दूसरा बड़ा योगदान शिशु शिक्षा निकेतन की स्थापना है। उस समय क्षेत्र में छोटे बच्चों के लिए अंग्रेज़ी माध्यम का कोई विद्यालय नहीं था। इस आवश्यकता को देखते हुए उन्होंने स्थानीय विधायक शिवनारायण मिश्रा के सहयोग से हनुमानगंज बाज़ार में शिशु शिक्षा निकेतन की नींव रखी, जिससे नन्हे बच्चों को आधुनिक व गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अवसर मिल सका। डॉ. रामकुमार द्विवेदी ने अपने प्रयासों से न केवल विद्यालयों की स्थापना की बल्कि यह भी सुनिश्चित किया कि संस्थान समाज के लिए बने रहें। उनकी दूरदर्शी सोच ने क्षेत्र में शिक्षा को नई ऊंचाइयां दीं और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित किया।

क्षेत्रीय राजनीति की धुरी
डॉ. रामकुमार द्विवेदी अपने गांव के प्रधान ही नहीं, क्षेत्रीय राजनीति के भी एक सशक्त धुरी थे। वे विधायक शिवनारायण मिश्रा के खासमखास थे। 80 के दशक में ट्रांसफर-पोस्टिंग के लिए पुलिस-प्रशासन के कर्मचारी उनकी क्लिनिक के आसपास मंडराते देखे जाते। 90 के दशक के बाद भी उनकी पकड़ बनी रही।

देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी भी उन्हें अच्छी तरह जानते थे। राजीव गांधी की हत्या की खबर जिस दिन आई, वे खाना खा रहे थे, बगल में ट्रांजिस्टर था। समाचार सुनते ही उनकी आंखों से आंसू बहने लगे, थाली छोड़ दी, रोते हुए उठ खड़े हुए। वे जीवन भर कांग्रेसी विचारधारा के समर्थक रहे। जब गांव चुनावों में सपा, भाजपा, बसपा में बंट जाता, उनका एकमात्र वोट कांग्रेस प्रत्याशी को ही जाता।

शिव मंदिर  का निर्माण 
70 के दशक में महानपुर गांव में हिंदुओं के लिए किसी भी प्रकार का पूजा स्थल नहीं था। ऐसे में वर्ष 1975 में  डॉ रामकुमार द्विवेदी ने अपनी जमीन  मंदिर के लिए दान की और उस पर विशाल शिव मंदिर की स्थापना की।  जो कालांतर में गांव के संपूर्ण हिंदू समाज की आस्था का केंद्र बना। वर्ष 2018 में उन्होंने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया और शिव जी के बगल हनुमान जी की भी प्रतिमा स्थापित की और यहां मंदिर में प्रतिवर्ष भंडारे का आयोजन शुरू किया। इस भंडारे में हर जाति वह धर्म के लोग आकर प्रसाद पाते थे।

19 सितंबर की शाम  मुस्कुरा कर चला गया नायक 
डॉ रामकुमार द्विवेदी  को हृदय की बीमारी थी। कुछ वर्षों पहले उन्हें  पहला अटैक आ चुका था। परिजनों ने उन्हें  एसजीपीजीआई लखनऊ में भर्ती कराया। जहां कुछ दिनों के इलाज के बाद वह स्वस्थ होकर घर लौटे! करीब 2 वर्ष पूर्व उन्हें पुनः ह्रदया घात हुआ।  एक बार फिर से उनका इलाज लखनऊ में हुआ, और वह स्वास्थ्य लाभ पाकर वापस आए।
विगत 19 सितंबर 2025 को वह रोज की तरह अपनी क्लीनिक से घर वापस आए,  कुछ देर बाद उन्हें सिर दर्द हुआ फिर उन्होंने कुछ दवाइयां खाई! थोड़ा राहत मिली।  फिर वह शाम के नित्य कर्म से निवृत होकर  पैर-हाथ व मुंह धोने के बाद बिस्तर पर बैठ गए। तदुपरांत उन्हें सीने में पीड़ा महसूस हुई।  परिजनों को भी कुछ एहसास हो गया था वह दौड़कर गंगाजल ले आए मुंह में डाला और फिर उनका शरीर हमेशा के लिए शांत हो गया था ! बावजूद इसके  परिजनों ने कार में लिटाकर जिला अस्पताल पहुंचाया जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

उनकी जीवित विरासत
डॉ. रामकुमार द्विवेदी का जीवन यह बताता है कि यदि ईमानदारी, करुणा, संस्कृति और विकास का भाव हो, तो एक व्यक्ति भी पूरे क्षेत्र को बदल सकता है। उनके व्यक्तित्व ने यह दिखाया कि एक साधारण ग्रामीण पृष्ठभूमि का व्यक्ति भी यदि करुणा, निस्वार्थ भाव और संकल्प से कार्य करे, तो पूरे क्षेत्र के लिए आदर्श बन सकता है। स्वास्थ्य, शिक्षा, संस्कृति और राजनीति हर क्षेत्र में उन्होंने जो बीज बोए, वे आज भी फल-फूल रहे हैं।

आज महानपुर, हनुमानगंज और आसपास के गांवों में उनकी छोड़ी हुई विरासत, विद्यालय, क्लीनिक, मंदिर, सांस्कृतिक परंपराएं और विकास के कार्य उन्हें जीवित रखे हुए हैं। डॉ. द्विवेदी केवल एक चिकित्सक या ग्राम प्रधान नहीं थे; वे एक विचार, एक चेतना और एक आंदोलन थे। आने वाली पीढ़ियों के लिए उनका जीवन यह प्रेरणा देता रहेगा कि समाज को बदलने के लिए बड़े पद या बड़े संसाधनों की नहीं, बल्कि बड़े दिल, ईमानदार नीयत और निरंतर सेवा की आवश्यकता होती है।

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